Wednesday, March 19, 2014

वाराणसी(अतीत के झरोखे से)

 मैं वाराणसी हूं, मुझे देखकर अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन के मुख ये शब्द अनायास ही प्रस्फुटित हो गये कि मैं समय से परे,इतिहास,संस्कृति,सभ्यता सबसे पुराना,पृथ्वी पर अवस्थित युगों युगों से मौजूद स्थान हूं । मैं एक ऐसा क्षेत्र हूं जो आदिकाल से गंगा की निर्मल धारा के साथ धर्म औऱ सत्य की अलौकिक ज्योति जला रहा है।मेरे सीने में कल-कल ध्वनि करती पापमोचनी गंगा जहां मोक्ष प्रदायनी है जिसके स्पर्श मात्र से ही सारे दुख दूर हो जाते हैं।मेरी गंगा की धारा पर आकाश दीप का टिमटिमाता प्रतिबिंब सौन्दर्य प्रेमियों को मोहित करने वाला है।दीपों औऱ तारों का ये मेल इतना मनमोहक है कि साहित्याकर मेरी अलौकिक छवि का वर्णन करनें से खुद को रोक नहीं पाये मेरे अनुपम दृश्य को देखकर सौन्दर्य प्रेमी जयशंकर प्रसाद द्विवेदी ने आकाश दीप नाम की कहानी ही लिख दी थी।
मेरे मेरी धरती पर आंख पढने के लिए खुलती है तो जीव्हा मंत्रोचार के लिए। मुझे स्पर्श करने की लालसा हर दिल मे हैं।मेरे पास कोई आने की चाहत रखे या न रखे लेकिन आने के बाद न जाने की चाहत जरूर रखता है।धर्म, दर्शन और साहित्य से संपूर्ण मानव जगत का हित साधने  वाला मेरा ये क्षेत्र घने रहस्य की तरह आकर्षक है।लगभग 100 घाटों की नगरी हूं मैं,मेरे घाटों की अलग कहानी है। अस्सी घाट और राजघाट के बीच अनगिनत घाट हैं जो युगों से मानव जाति का कल्याण करते आये हैं। दशाश्वमेध घाट पर कपड़ों और कैनवास की बनी छतरियों के नीचे बैठे पंडे मेरी पहचान हैं। सुबह के सूर्य की तेजस्वी किरणों के आगमने से पहले ही मेरे ये घाट जाग जाते हैं। ब्रम्ह मूहूर्त मे डूबकी लगाते लोंगे के मुख से निकले हर हर गंगे औऱ बंम बंम भोले की गूंज रात की निद्रा तोडती है।शंख की नाद औऱ मंदिर के घंटो की मधुर ध्वनि से प्रभात का स्वागत होता है, यहां की सुबह मनभावनी है।तभी तो कहा जाता है सुबहे बनारस ।
मैं मंदिरों का शहर हूं। काशी विश्वनाथ, संकट मोचन, मानस मंदिर जैसे अनेको मंदिर है मेरी धरती पर जहां श्रद्धा का अर्ध हर समय चढता नजर आयेगा आपको। देश विदेश से प्रतिसाल 2 लाख से अधिक श्रद्धालु व पर्यटक ज्ञान व मोक्ष की प्राप्ति की चाह लिये मेरे दर पर आते हैं। वेदव्यास जी ने मेरी महिमा का वर्णन करते हुये लिखा है..
गंगा तरंगा रमणीय जटाकलापम
गौरी निरंतर विभूषिता वामाभागम
नारायाणाप्रिया अनंगा मदापहारम,
वाराणसी पूर पतिम भज विश्वनाथं                                            
मेरा इतिहास इतना वृहद औऱ विशाल है कि अगर लिखना प्रारंभ किया जाए तो एक युग कम पड जाएगा। गंगा तट पर बसा मैं एक प्राचीन क्षेत्र हूं। प्राचीन काल मे मुझे अविमुक्ता,आनन्दकानन,महासमासना,सुरधना,रम्या औऱ काशी के नाम से जाना जाता था लेकिन कालांतर मे वरुणा औऱ असि नदियों के उद्गम स्थल पर बसे होने के कारण मैं वाराणसी हो गया। युग युगांतर से मेरे अनेकों नाम रहे है। किवदंतियों के अनुसार हजारों वर्ष पूर्व कुछ नाटे कद के सांवले लोगों ने मेरी नींव डाली थी। तभी यहां कपडे औऱ चांदी का व्यापार शुरु हुआ। कुछ समय उपरांत पश्चिम से आये ऊंचे कद के गोरे लोगों ने मुझे अपनाया जिनको पुराणों मे आर्य यानि श्रेष्ठ व महान कहा गया।बाद मे आर्यों का मै पनाहगाह बन गया, अयोध्या में भी तभी उनका राजकुल बसा जिसे इक्ष्वाकु का कुल कहा गया। काशी मे चन्द्र वंश की स्थापना हुयी। सैकडों वर्ष मेरे इस क्षेत्र पर भरत राजकुल के चन्द्रवंशी राजा राज करते रहे।
मै आदिकाल से धर्म औऱ शिक्षा की औलौकिक ज्योति जलाता रहा हूं। सदियों पहले मेरी गोद मे बैठ कर सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने दुनिया को सत्य का पाठ पढाया। युगों युगों से गंगा के तटों पर बैठ कर न जाने कितने महात्मा सनातन धर्म के रक्षार्थ तप औऱ यज्ञ करते आये हैं।पुराणों के अनुसार मै भगवान भोले नाथ के त्रिशूल पर बसा हूं। ऐसा माना जाता है कि पूरे विश्व का विनाश हो सकता है पर मेरा नहीं क्योंकि मै पृथ्वी से अलग हूं।
धर्म से लेकर संस्कार तक औऱ शिक्षा से लेकर सियासत तक मै प्रारम्भ से ही हर जगह प्रासंगिक रहा हूं। दुनिया का सबसे पुराना शिक्षा केन्द्र आज भी मेरे वक्ष स्थल पर उसी शान से जिंदा है जिस शान से सदियों पहले इसकी स्थापना हुई थी। मैं उत्तर प्रदेश का एक मात्र ऐसा नगर हूं जहां पांच विश्वविद्यालय पूरे देश मे शिक्षा की अलख  जगा रहे हैं।आज भी दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता के निशान खुद मे सजोये हुये मेरे शहर की खूबसूरती,इसकी सादगी कण कण में विद्यमान है।
देश की कई महान विभूतियों ने मेरी शोभा बढाई है। महर्षि अगस्तय की तपोस्थली हूं मै तो उस्ताद विस्मिल्ला खान की शहनाई मे मेरी धरती ने ही मिश्री घोली। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत घराने का सूत्राधार मैं ही हूं। मैं कवि,पंडित,दार्शनिक,संगीतकार औऱ लेखकों की कर्म भूमि रहा हूं। जयशंकर प्रसाद,तैलंग,बाबा किनाराम,मुंशी प्रेमचंद्र,गोस्वामी तुलसीदास,हरि प्रसाद चौरसिया,उस्ताद विस्मिल्लाह खान औऱ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे ना जाने कितने नाम है जिनकी लेखनी को धार दी है मैंने। मेरी गोद मे बैठ कर ही बंगाली साहित्यकार विभूती भूषण बन्धोपाध्याय ने बांग्ला उपन्यास अपराजिता की रचना की थी। मेरी धरती पर रचा गया यह वही उपन्यास है जिस को आधार बनाकर सत्यजीत राय ने कालजयी कृति अप्पू ट्रीलॉजी का निर्माण किया औऱ तो औऱ इस फिल्म की शूटिंग भी मेरी वादियों मे ही की गयी। कर्टवेलीस नें ओपेर राइस एंड फाल आफ दी सिटी आफ महागॉनी मे बनारस गीत की रचना की। मैं साहित्य जगत को तुलसी दास जी के समय से ही आकर्षित करता रहा हूं..जापानी लेखक सुशाकु एन्डू ने डीप रिवर,ज्योफ डेयर ने 2009 में उपन्यास जेफ इन वेनिस डेथ इन वाराणसी तथा चेतन भगत नें अपने उपन्यास रेवुल्युशन 2020 में मेरा उल्लेख किया है।
मायानगरी के लिये मेरी भूमि जहां फिल्मों का आधार स्तम्भ रही है वही हालीवुड की नामचीन हस्तियों के लिये भी मैं आकर्षण का केन्द्र रहा हूं। मैडोना तो मेरी वादियां में ऐसी खोई की तीन महीने का समय कब गुजर गया उन्हे पता ही नहीं चला। गोल्डी हान ,जुलिया राबर्टस,ब्रेड पिट,केट विन्सलेट,एंजलीना जोली,पेरिस हिल्टन,टांम क्रूज जैसे विदेशी कलाकर मेरे अंचल की कला,संस्कृति औऱ सभ्यता के आगे नत मस्तक हो चुके हैं।
मेरी साडियों का ऐसा आकर्षण है कि हर नारी इनमे लिपटकर आइना देखना चाहती है।मेरे पान की लाली की लालिमा का गान सिनेमा जगत भी करता है। शिव की नगरी मे बनी ठंढई की मादकता औऱ शीतलता की दुनिया दीवानी है।यहां का लंगडे आम की मिठास के आगे मिश्री का स्वाद भी फीका लगता है। गले मे लाल गमछा डालकर गलियों मे फिरते लोग मेरी पहचान है। मुह में पान औऱ गले मे लाला गमछा डाल कर गलियों मे फिरते लोगों को रौब को ही देख कर किसी ने इन्हे बनारसी बाबू कहा था। मेरे लोग विश्व के कोने कोने मे निवास करते है भले ही मेरे लोगो के घर बदलते रहे हो लेकिन बनारसी बाबुओं की ठसन आज तक नहीं बदली है।
हस्तशिल्प का एक नायाब उदाहरण हूं मैं। प्रदेश का इकलौता रेल इंजन कारखाना डीरेका मेरे ह्रदय स्थल पर स्थित है। एक तरफ मैंने महामना मदन मोहन मालवीय के सपनों को मूर्त रुप लेते हुये देखा है। तो दूसरी तरफ एक झोपडी से निकलकर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले लालबहादुर शास्त्री के संघर्षों का गवाह भी हूं मैं। न जाने कितने उपनिषद,पुराण,ग्रंथ औऱ साहित्य मेरे अंतस से निकल कर पूरे विश्व को प्रकाशवान कर रहे हैं।
मैंने भारतीय राजनीति को कमला पति त्रिपाठी,लाल बहादुर शास्त्री औऱ राजा विभूतिनरायण सिंह जैसे शिखर पुरुष दिये हैं। इतनी बडी उपल्ब्धि होने औऱ धर्म की नगरी होने के बाद भी मै विगत कुछ सालों से अपराधियों का पसंदीदा स्थल बन गया हूं। अपहरण औऱ डकैती जैसे अपराध यहां उद्योग का रुप ले रहे हैं। शिव की नगरी मे कानून की धज्जियां उड रही हैं।
मै उत्तर प्रदेश का सबसे सघन आबादी वाला शहर हूं। मेरी गलियां तो इतनी प्रसिद्ध है कि इनका जिक्र फिल्म से लेकर इल्म तक मे होता है। बेतरतीब बसे होने के कारण उचित विकास का आभाव यहां हर तरफ व्याप्त है। घाटों का उचित व्यवस्थापन,शहर मे फैली गंदगी औऱ निकासी व्यवस्था का नितांत आभाव है। विकास औऱ कानून व्यवस्था का हाल बेहाल है।आलम ये है कि आज मैं विकास को खोजते खोजते अपनी ही गलियों मे खोता जा रहा हूं। लोगों को आज मेरी फिक्र नहीं फिक्र इस बात की है कि कौन मेरी धरती पर चुनाव कौन लड़ रहा है..चुनाव कोई भी लडे लेकिन जीते वही जो मुझे औऱ मेरी जनता को एक नई पहचान दे सके क्योंकि मेरी पहचान मेरा अस्तित्व प्राचीन काल से वही है जो आज है लेकिन विकास की एक नई पहचान की मुझे बरसों से दरकार है..
केदारनाथ सिंह की पंक्तियों में कहूं तो,

किसी अलक्षित सूर्य को देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टांग से बिल्कुल बेखबर।


Saturday, February 15, 2014

इस बार किचड होली

भई किसी जमाने में जमाना इत्ता खराब रहिस की पंकज उधास रेडियो पर बेनकाब नहीं निकलन की नसीहत देत रहे औऱ अब जमाना इत्ता खराब से कि नकाब उतारे के भी कालिख पोती जा रही है भई सबका रुआब खतरे में सै..टीवी पर कीचड ही फीचर है..अरे आम आदमी ने पार्टी बना ली तो सारे खास आदमी की सूरत औऱ सीरत खतरे में पडरइस है...सुना है आम आदमी अपनी झाडू में कीचड लपेटे घूम रहे हैं..जब से कुछ खास आदमी के मुंह पर कीचड भरी झाडू पडी है..तब से सारे खास आदमी सतर्क है औऱ आम आदमी से खुन्नस निकालने की ताड में हैं..सब ने अपनी अपनी जेब तक में कीचड भर रखा है..जब जरुरत पड रही है निकाल कर दूसरे के मुंह पे पोत दे रहे है.. अन्ना जान गये थे कि कीचड होली खेली जानी है सो अबकी वो अनशन करने दिल्ली नहीं आये बल्कि रालेगान सिद्धी में ही बिस्तर लगा लिया..पोलिंग का पोल अब खुल चुका है..कहते हैं कि कीचड में कमल खिलेगा....सब कुछ टम्प्रैरी लग रहा है बस परमानेंट है तो बस कीचड.. हर कोने में पीक है, बाकी सब ठीक है. जहां भी सफाई है, अस्थाई है.कीचड परमानेंट है स्थाई है..कई तो पहले से ही कीचड में सने घूम रहे थे उन्हे थोडी कम दिक्कत है लेकिन वो लोग खासे परेशान है जो कीचड देख कर रास्ता बदल देते थे..लेकिन इस बार तो जिस रास्ते जा रहे हैं वही पर कोई न कोई मिल जा रहा है नहलाने के लिए..बाल्टी भर कीचड लिए...सो इस बार कीचड से अपने दामन को बचाना मुस्किल लग रहा है..

Thursday, February 13, 2014

दलितों पर दंगल


तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार,   जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी..  'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है... ये महज चुनावी नारे नहीं बल्कि सियासत का वो अध्याय है जिसके हर एक पन्ने पर दलित राजनीति की इबारत लिखी है...औऱ इसी के सहारे पहले काशी राम ने औऱ फिर मायावती ने दलितों को उनकी सियासी ताकत का अहसास कराया।उत्तर प्रदेष से उठी अहसास कराया...उत्तर प्रदेश से उठी दलित राजनीति की यह लहर हांथी पर सवार होकर दिल्ली कूच करने की तैयारी में हैं.. हांथी की मदमस्त चाल को रोकने के लिए हर राजनीतिक पार्टी दलितों को अपने पाले में करने की तैयारी में है....

 देश के 12 राज्यों में दलितों का दबदबा है......उत्तर  प्रदे में सबसे ज्यादा 351.5 लाख दलित वोटर्स हैं...वेस्ट बंगाल में 184.5 लाख,महाराष्ट्र में 98.8 लाख,राजस्थान में 96.9 लाख,मध्य प्रदेश में 91.6 लाख,कर्नाटक में 85.6 लाख, पंजाब में 70.3 लाख, ओडिसा में 60.8 लाख औऱ हरियाणा में 40.9 लाख दलित वोटर हैं...   देश की कुल आबादी का 17 फीसदी हिस्सा दलितों का  है....लोकसभा की 543 सीटों में से 84 सीट अनुसूचित औऱ 47 सीट अनुसूचित जन जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है.. आंकडो के मुताबिक दलितों का 50 फीसदी वोट पर क्षेत्रीय पार्टियों का कब्जा है... वही दलितों का 30 फीसदी वोट कांग्रेस को  ,12 फीसदी भाजपा को औऱ 8 फीसदी वोट अन्य पार्टियों को मिलता है.... दलितों की आधी आबादी यूपी,बिहार,बंगाल, पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु में है.... उत्तर प्रदेश में 21.1 फीसदी , पश्चिम बंगाल में 23.0 फीसदी, बिहार में 8.2 प्रतिशत, तमिलनाडू में 19.0 प्रतिशत.इन राज्यों में लोकसभा की 201 सीटें हैं..... दलित वोट बैंक पर पकड रखने वाली पार्टियों का दबदबा  इन राज्यों में शुरु से रहा है....
 हिन्दी पट्टी के राज्यों में दलित वोट बैंक पर सबसे मजबूत पकड बीएसपी की रही है....लेकिन हाल में हुये पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के नतीजे बीएसपी के लिए बेहतर नहीं रहे.....आंकडों से साफ है कि राजस्थान में 17.09 फीसदी,मध्यप्रदेश में 15.7,छत्तीसगढ में 11.61 औऱ दिल्ली में 16.92 फीसदी दलित वोटर्स का विभाजन हुआ.. यानि यह तो साफ है कि कहीं न कहीं दलित वोटर्स भी इस बार के चुनाव में उन सीमाओं को तोडने वाला है..जिनमें उन्हे आज तक बंधा हुआ माना जाता रहा है......
 विकल्प औऱ सुशासन के संकलप के साथ चुनावी मैदान में उतरी भाजपा भी इस बार सवर्णों औऱ बनियों की पार्टी का चोला उतारने के लिए बेचैन है..बीजेपी इस बात को बखूबी जानती है कि दिल्ली पर कब्जा करने के लिए उसे 2009 के मुकाबले 2014 में करीब 10 फीसदी अधिक वोट हासिल करने होंगे... इस लिए पार्टी की नजर दलित वोटर्स पर है....गुजरात में 50 फीसदी दलित वोट मिलने से उत्साहित बीजेपी ने पूरे देश के दलित वोट बैंक में बडी सेंध लगाने के लिए रणनीति बनानी शुरु कर दी है....पार्टी  दलित एकादशी सीरीज नाम से 11 दिनों तक चलने वाले कार्यक्रम का आयोजन करने वाली है.......इसके तहत बाबू जगजीवन राम के जन्मदिन 5 अप्रैल से लेकर बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल तक पार्टी देश भर में दलितों की दशा औऱ दिशा पर चिंतन करेगी..बीजेपी को पुरानी पीढी के दलितों से ज्यादा युवा पीढी पर भरोसा है.... इस लिए उसके निशाने पर  इस समाज के पढे-लिखे मिडिल क्लास नौजवान हैं....
 दलित वोटो पर कब्जा करने का दंगल शुरु होने वाला है लेकिन..सबसे अहम सवाल ये है कि जिन  मुद्दों पर कांग्रेस, बीजेपी,लेफ्ट,सपा जैसी पार्टियां 2014 का मैदान मारना चाहती है क उनमें से कितने मुद्दे दलित हितों से जुडे हैं...सवाल ये भी है कि क्या दलित अपने हितों को भुलाकर उन मुद्दों पर मतदान करेंगे जो तमाम सियासी पार्टियां उछाल रही हैं....  
 भले ही देश की राजनीतिक पार्टियों की नजर दलित वोट बैंक में टिकी हो लेकिन इन पार्टियों के लिए दलित वोट बैंक में सेंध लगापाना आसान नहीं हैं.. खासतौर से यूपी में जहां 2009 में बीएसपी ने भले ही 20 सीटें जीती लेकिन वह 47 सीटों पर दूसरे नम्बर थी...इसी आंकडे के सहारे हांथी पर सवार मायावती सभी राजनैतिक दलों को कुचलते हुए दिल्ली कूच करने की तैयारी में हैं....ऐसे में मायावती की मुट्ठी से दलित मतदाताओं को निकाल पाना आसान नहीं है.. वहीं बिहार की दलित राजनीति एक दिलचस्प मोड पर है जहां दलित वोट बैंक के एक नहीं कई दावेदार मैदान में हैं...रामविलास पासवान का अपना वोट बैंक है तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद का अपना आधार....महा दलित का नारा लगाकर दलित वोट बैंक को दो फार करने की नितीश की कोशिश अपने चरम पर है.....तो बीजेपी के पास दलित नेताओं की एक लम्बी चौडी फौज है जो दलितों को केसरिया रंग में रंगने को बेकरार है...तमिलनाडु की दलित राजनीति पर पारंपरिक रुप से डीएमके औऱ अन्नाद्रमुक का कब्जा रहा है...लेकिन बंगाल में लेफ्ट सरकार के पतन के बाद देखना दिलचस्प होगा की वहां के दलित वोटर एक बार फिर दीदी के साथ जाते हैं या फिर वो वामदलों का रुख करने के मूड में है.... 
 माना जाता है.कि 2014 का फैसला 14 करोड से ज्यादा वो युवा वोटर्स करेंगे जो पहली बार मतदान केन्द्रों पर पहुंचेंगे....लेकिन राजनीतिक पार्टियां जिस तरह से दलितों पर दंगल करने की तैयारी में हैं उसकी पूरी तस्वीर चुनाव के नतीजों से उभरेगी




Sunday, February 2, 2014

रो रहा हूं मैं( अमेठी)

मैं अमेठी हूं,पहले मैं सुल्तानपुर जिले की एक तहसील था पर कालांतर में मेरा इतिहास औऱ भूगोल बदल दिया गया। मेरा नाम दो बार बदला गया औऱ आज मैं अमेठी नहीं छत्रपति शाहू जी महराज के नाम से एक जिले के रुप में जाना जाता हूं। पर ना जाने क्यों मेरा मन अमेठी मे ही बसता है। मैं संसदीय क्षेत्र के रुप मे अमेठी ही हूं। आजादी के बाद से ही मैं नेहरु-गॉधी परिवार का चहेता रहा हूं। 1980 से मेरा प्रतिनिधित्व इसी परिवार के हाथों में है। मैंने आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले औऱ सूचना क्रांति के जनक राजीव गांधी के रुप में देश को एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री दिया। मैं उस वक्त चर्चा मे आया जब कांग्रेस के छोटे सरकार कहे जाने वाले संजय गांधी ने लोकसभा में जाने के लिए मुझे चुना। तभी से मेरा नाम गांधी नेहरु परिवार के नाम से जुड गया। आज भी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी लोक सभा में मेरा ही प्रतिनिधित्व करते हैं।
गांधी परिवार के चार सदस्य मेरे क्षेत्र से चुनाव लड चुके हैं औऱ मेरी जनता ने उन्हें लोकसभा तक पहुचाया है। जवाहर लाल नेहरु के पिता औऱ इंदिरा गांधी के दादा मोती लाला नेहरु ने अपनी वकालत की शुरुआत यहीं से की थी। आज मैं भले ही गांधी परिवार का चहेता हूं , लेकिन उस हिसाब से मेरा विकास नहीं हो पाया है। इस बार विकास औऱ प्रगति की बहुत सी उम्मीदे मैने सजा रखी हैं ।
उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों की भांति मेरी आर्थिक प्रगति कृषि पर आधारित है। परंतु दुख इस बात का है कि देश के सबसे बडे घराने के इतना करीब होने के बावजूद मेरे किसान भाइयों की हालत में कोई सुधार नहीं आया है। किसानो को समय पर खाद औऱ बीज नहीं मिल पाता तो सिंचाई सुविधा के अभाव में उन्हें मजबूरन खेती से मुंह मोडना पड रहा है।
यूं तो मेरे यहां कल कारखाने खोलने के कई वायदे कई सालों से हो रहे हैं। लेकिन आज भी रोजगार के मामले में भी मैं फिसड्डी साबित हो रहा हूं। रोजगार के लिये यहॉ के युवाओं अन्यत्र पलायन करना पड रहा है।

शिक्षा को बढावा देने के लिये कई घोषणायें भी हुयी हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने यहां पर आईआईटी समेत कई उच्च शिक्षण संस्थान स्थापित करने के वायदे किये हैं, पर अब तलक उन्हें अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। देश के मानचित्र पर गर्व से अपना सिर उठाये मैं अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा हूं सिर्फ इस वजह से कि राहुल गॉधी को रुप में मैंने वह जन प्रतिनिधि पाया है जो संसद में मेरा प्रतिनिधित्व करता है,पर कभी-कभी मुझे लगता है कि बस दिल को बहलाने का यह ख्याल अच्छा है। इस बार उम्मीद के दिये फिर जले हैं..कुछ लोग मेरी धरती पर आये हैं..जिन्होंने मेरी तस्वीर बदलने का वादा किया है..देखता हूं क्या होगा मेरा।

Friday, January 31, 2014

आम चुनाव : छोटे दलों के बडे मंसूबे..

छोटे दल बडा मंसूबा

 पन्द्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए होने वाले आम चुनाव में अहम मुद्दो के गायब होने औऱ किसी लहर के आभाव में चुनाव के बाद त्रिशंकु स्थिति के आसार अगर नजर आते हैं तो ऐसे में क्षेत्रीय औऱ छोटे दले की भूमिका बढ जाएगी।लोकसभा चुनाव में बाजी मारने वाली दो ही पार्टियों का नाम आता था..बीजेपी या फिर कांग्रेस..नाम भले ही दो पार्टियों का लिया जाता रहा हो लेकिन आशय दो गठबंधन से ही होता था..यूपीए औऱ एनडीए.. एक वक्त था जब देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी फिर भाजपा ने अपने नाम का डंका बजाया..लेकिन इसके बाद मिली जुली सरकार की ऐसी बानगी बनी की पूरा देश गठबंधन की राजनीति के बीच चक्कर काटने लगा..केन्द्र में पहले 22 दलो के गठबंधन वाली एनडीए सरकार बनी औऱ फिर दो बार कांग्रेस की यूपीए गठबंधन की..इस बार भी ऐसा लग रहा है कि किसी को पूर्ण बहुमत न मिले... इसी संभावना के मद्देनजर क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं भी जोर मारने लगी हैं।  पहले आम चुनाव में देश में 14 राष्ट्रीय दल थे औऱ क्षेत्रीय दलों की संख्या केवल 39 थी वहीं 2009 के लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय दलों की संख्या 7 रह गयी औऱ क्षेत्रीय दल कुल मिलाकर 360 हो गए थे... पहली लोकसभा चुनावों में भाग लेने वाले क्षेत्रीय दलों को सिर्फ 34 सीटों पर संतोष करना पडा था वहीं आंकडे बताते हैं कि 2009 के चुनावों में देश से क्षेत्रीय दलों के 146 सांसद जीतने कर आये..आंकडे यह भी बताते हैं कि इन दलों को कुल मतदाताओं के आधे से अधिक का समर्थन मिला था।
                                               कांग्रेस भले ये दावा ठोके कि उसके पास मजबूत संगठन औऱ चाक-चौबंद रणनीति है लेकिन इस बार उसे अपने सहयोगी दलों से जूझना पड सकता है...इन सहयोगी दलों में शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा,मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा,लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल औऱ राम विलास पासवान के नेतृत्व वाली लोकजन शक्ति पार्टी शामिल है।ऐसे हालात में कांग्रेस के पक्ष में हवा है ये कहना गलत होगा। सत्ता रुढ गठबंधन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथ साथ मुख्य विपक्षी गठबंघन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी इस चुनाव में बहुत अच्छी स्थिति में नहीं लगता। पिछले 12 साल से राजग का हिस्सा रहे बीजू जनता दल ने भाजपा औऱ राजग से किनारा कर लिया है..उधर वाम मोर्चा तीसरा मोर्चा खडा करने की जुगत में है..अनुमान है कि नतीजे आने के बाद कई दल उनके पाले में जा सकते हैं...
 पिछली सरकार की बात करें तो कांग्रेस के 151 में से 30 सांसद 42 सीट वाले आंध्र प्रदेश से चुने गए थे...द्रमुक की अगुवाई वाल डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्तारुढ यूपीए का सबसे बडा भागीदार है। तमिलनाडु में लोकसभा की 39 सीटें हैं औऱ इस फ्रंट ने 39 में 39 सीटे जीती थी..यूपीए के दूसरा सबसे बडा घटक लालू प्रसाद की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनता दल है जिसने कुल 40 लोकसभा सीटों में से 23 पर फतह हासिल की थी..इस तरह से आंध्र प्रदेश,बिहार,औऱ तमिलनाडु से 100 से ज्यादा सांसद संप्रग की झोली में आए थे औऱ इन्हीं राज्यों में अगले चुनाव की किस्मत की चाबी है।
भाजपा भले ही इस चुनाव में सबसे बडी ताकत बन कर उभरे लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि भाजपा या कांग्रेस को 160-170 से अधिक सीटे नहीं मिल सकती है,ऐसी स्थिति में तीसरा मोर्चा उनका होगा जिन्हें हम क्षेत्रीय दल कहते है....वामपंथी दलों को इसी में शामिल किया जा सकता है लेकिन इस मोर्चे की ताकत भी भाजपा-कांग्रेस के आस-पास जितनी ही होगी..इस बार जो नयी आकृति उभरी है वह है आम आदमी पार्टी..भले ही आप ने पहली बार में दिल्ली की गद्दी जीत ली हो लेकिन देश की राजधानी दिल्ली की गद्दी को वो दूर से ही देख सकती है...अनुमान लागाए जा रहे हैं कि इस बार के चुनाव  आप जो सेंध लगाएगी उसमें से 15-20 से लेकर 30-40 सीटे मिल सकती है..अगर आप 30 से 40 सीटों का आंकडा छू पाती है तो संभव है कि तीसरी पार्टी बडी पार्टी आप ही बने औऱ अगर ऐसा नहीं होता है तो भी देश के अन्य प्रमुख क्षेत्रीय दल जैसे सपा,बसपा,जेडीयू,द्रमुक,अन्ना द्रमुक जितनी ताकतवर तो आप भी बनेगी..यानी तब संसद में एक औऱ क्षेत्रीय दल होगा..
यह अवश्य देखने की बात होगी कि न किसी को समर्थन देंगे, न किसी से समर्थन लेंगे का नारा लगाने वाली आप अगली संसद में कैसी भूमिका निभाती है? मगर, इतना तो अभी से दिख रहा है कि देश के छोटे दल अगली लोकसभा में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी में हैं। यह एक हकीकत है कि पिछले लगभग 25 साल में केंद्र की सरकारें क्षेत्रीय ताकतों के सहारे से ही चली हैं और आगे भी आसार ऐसे ही दिख रहे हैं।
 सवाल यह है कि क्षेत्रीय दलो का सहारा भाजपा या कांग्रेस के लेए गले की फांस तो नहीं बन जाएगा..औऱ अगर ऐसी स्थिति आती है कि गैरे कांग्रेसी औऱगैर भाजपाई दलों को सरकार बनाने का मौका मिला तो अपने हिस्से के नाम पर सत्ता में बंदरबांट तो नहीं होगी...आदर्श स्थित तो यह है कि आगामी चुनाव  में किसी एक दल अथवा गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिले लेकिन अगर गठबंधन को मौका मिलता है तो स्थिति समझौतों वाली बनती है। सियासत में समझौता बुरा नहीं है लेकिन समझौता सत्ता के लिए नहीं सुशासन के लिए होना चाहिए...