Thursday, February 13, 2014

दलितों पर दंगल


तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार,   जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी..  'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है... ये महज चुनावी नारे नहीं बल्कि सियासत का वो अध्याय है जिसके हर एक पन्ने पर दलित राजनीति की इबारत लिखी है...औऱ इसी के सहारे पहले काशी राम ने औऱ फिर मायावती ने दलितों को उनकी सियासी ताकत का अहसास कराया।उत्तर प्रदेष से उठी अहसास कराया...उत्तर प्रदेश से उठी दलित राजनीति की यह लहर हांथी पर सवार होकर दिल्ली कूच करने की तैयारी में हैं.. हांथी की मदमस्त चाल को रोकने के लिए हर राजनीतिक पार्टी दलितों को अपने पाले में करने की तैयारी में है....

 देश के 12 राज्यों में दलितों का दबदबा है......उत्तर  प्रदे में सबसे ज्यादा 351.5 लाख दलित वोटर्स हैं...वेस्ट बंगाल में 184.5 लाख,महाराष्ट्र में 98.8 लाख,राजस्थान में 96.9 लाख,मध्य प्रदेश में 91.6 लाख,कर्नाटक में 85.6 लाख, पंजाब में 70.3 लाख, ओडिसा में 60.8 लाख औऱ हरियाणा में 40.9 लाख दलित वोटर हैं...   देश की कुल आबादी का 17 फीसदी हिस्सा दलितों का  है....लोकसभा की 543 सीटों में से 84 सीट अनुसूचित औऱ 47 सीट अनुसूचित जन जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है.. आंकडो के मुताबिक दलितों का 50 फीसदी वोट पर क्षेत्रीय पार्टियों का कब्जा है... वही दलितों का 30 फीसदी वोट कांग्रेस को  ,12 फीसदी भाजपा को औऱ 8 फीसदी वोट अन्य पार्टियों को मिलता है.... दलितों की आधी आबादी यूपी,बिहार,बंगाल, पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु में है.... उत्तर प्रदेश में 21.1 फीसदी , पश्चिम बंगाल में 23.0 फीसदी, बिहार में 8.2 प्रतिशत, तमिलनाडू में 19.0 प्रतिशत.इन राज्यों में लोकसभा की 201 सीटें हैं..... दलित वोट बैंक पर पकड रखने वाली पार्टियों का दबदबा  इन राज्यों में शुरु से रहा है....
 हिन्दी पट्टी के राज्यों में दलित वोट बैंक पर सबसे मजबूत पकड बीएसपी की रही है....लेकिन हाल में हुये पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के नतीजे बीएसपी के लिए बेहतर नहीं रहे.....आंकडों से साफ है कि राजस्थान में 17.09 फीसदी,मध्यप्रदेश में 15.7,छत्तीसगढ में 11.61 औऱ दिल्ली में 16.92 फीसदी दलित वोटर्स का विभाजन हुआ.. यानि यह तो साफ है कि कहीं न कहीं दलित वोटर्स भी इस बार के चुनाव में उन सीमाओं को तोडने वाला है..जिनमें उन्हे आज तक बंधा हुआ माना जाता रहा है......
 विकल्प औऱ सुशासन के संकलप के साथ चुनावी मैदान में उतरी भाजपा भी इस बार सवर्णों औऱ बनियों की पार्टी का चोला उतारने के लिए बेचैन है..बीजेपी इस बात को बखूबी जानती है कि दिल्ली पर कब्जा करने के लिए उसे 2009 के मुकाबले 2014 में करीब 10 फीसदी अधिक वोट हासिल करने होंगे... इस लिए पार्टी की नजर दलित वोटर्स पर है....गुजरात में 50 फीसदी दलित वोट मिलने से उत्साहित बीजेपी ने पूरे देश के दलित वोट बैंक में बडी सेंध लगाने के लिए रणनीति बनानी शुरु कर दी है....पार्टी  दलित एकादशी सीरीज नाम से 11 दिनों तक चलने वाले कार्यक्रम का आयोजन करने वाली है.......इसके तहत बाबू जगजीवन राम के जन्मदिन 5 अप्रैल से लेकर बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल तक पार्टी देश भर में दलितों की दशा औऱ दिशा पर चिंतन करेगी..बीजेपी को पुरानी पीढी के दलितों से ज्यादा युवा पीढी पर भरोसा है.... इस लिए उसके निशाने पर  इस समाज के पढे-लिखे मिडिल क्लास नौजवान हैं....
 दलित वोटो पर कब्जा करने का दंगल शुरु होने वाला है लेकिन..सबसे अहम सवाल ये है कि जिन  मुद्दों पर कांग्रेस, बीजेपी,लेफ्ट,सपा जैसी पार्टियां 2014 का मैदान मारना चाहती है क उनमें से कितने मुद्दे दलित हितों से जुडे हैं...सवाल ये भी है कि क्या दलित अपने हितों को भुलाकर उन मुद्दों पर मतदान करेंगे जो तमाम सियासी पार्टियां उछाल रही हैं....  
 भले ही देश की राजनीतिक पार्टियों की नजर दलित वोट बैंक में टिकी हो लेकिन इन पार्टियों के लिए दलित वोट बैंक में सेंध लगापाना आसान नहीं हैं.. खासतौर से यूपी में जहां 2009 में बीएसपी ने भले ही 20 सीटें जीती लेकिन वह 47 सीटों पर दूसरे नम्बर थी...इसी आंकडे के सहारे हांथी पर सवार मायावती सभी राजनैतिक दलों को कुचलते हुए दिल्ली कूच करने की तैयारी में हैं....ऐसे में मायावती की मुट्ठी से दलित मतदाताओं को निकाल पाना आसान नहीं है.. वहीं बिहार की दलित राजनीति एक दिलचस्प मोड पर है जहां दलित वोट बैंक के एक नहीं कई दावेदार मैदान में हैं...रामविलास पासवान का अपना वोट बैंक है तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद का अपना आधार....महा दलित का नारा लगाकर दलित वोट बैंक को दो फार करने की नितीश की कोशिश अपने चरम पर है.....तो बीजेपी के पास दलित नेताओं की एक लम्बी चौडी फौज है जो दलितों को केसरिया रंग में रंगने को बेकरार है...तमिलनाडु की दलित राजनीति पर पारंपरिक रुप से डीएमके औऱ अन्नाद्रमुक का कब्जा रहा है...लेकिन बंगाल में लेफ्ट सरकार के पतन के बाद देखना दिलचस्प होगा की वहां के दलित वोटर एक बार फिर दीदी के साथ जाते हैं या फिर वो वामदलों का रुख करने के मूड में है.... 
 माना जाता है.कि 2014 का फैसला 14 करोड से ज्यादा वो युवा वोटर्स करेंगे जो पहली बार मतदान केन्द्रों पर पहुंचेंगे....लेकिन राजनीतिक पार्टियां जिस तरह से दलितों पर दंगल करने की तैयारी में हैं उसकी पूरी तस्वीर चुनाव के नतीजों से उभरेगी




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