Wednesday, March 19, 2014

वाराणसी(अतीत के झरोखे से)

 मैं वाराणसी हूं, मुझे देखकर अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन के मुख ये शब्द अनायास ही प्रस्फुटित हो गये कि मैं समय से परे,इतिहास,संस्कृति,सभ्यता सबसे पुराना,पृथ्वी पर अवस्थित युगों युगों से मौजूद स्थान हूं । मैं एक ऐसा क्षेत्र हूं जो आदिकाल से गंगा की निर्मल धारा के साथ धर्म औऱ सत्य की अलौकिक ज्योति जला रहा है।मेरे सीने में कल-कल ध्वनि करती पापमोचनी गंगा जहां मोक्ष प्रदायनी है जिसके स्पर्श मात्र से ही सारे दुख दूर हो जाते हैं।मेरी गंगा की धारा पर आकाश दीप का टिमटिमाता प्रतिबिंब सौन्दर्य प्रेमियों को मोहित करने वाला है।दीपों औऱ तारों का ये मेल इतना मनमोहक है कि साहित्याकर मेरी अलौकिक छवि का वर्णन करनें से खुद को रोक नहीं पाये मेरे अनुपम दृश्य को देखकर सौन्दर्य प्रेमी जयशंकर प्रसाद द्विवेदी ने आकाश दीप नाम की कहानी ही लिख दी थी।
मेरे मेरी धरती पर आंख पढने के लिए खुलती है तो जीव्हा मंत्रोचार के लिए। मुझे स्पर्श करने की लालसा हर दिल मे हैं।मेरे पास कोई आने की चाहत रखे या न रखे लेकिन आने के बाद न जाने की चाहत जरूर रखता है।धर्म, दर्शन और साहित्य से संपूर्ण मानव जगत का हित साधने  वाला मेरा ये क्षेत्र घने रहस्य की तरह आकर्षक है।लगभग 100 घाटों की नगरी हूं मैं,मेरे घाटों की अलग कहानी है। अस्सी घाट और राजघाट के बीच अनगिनत घाट हैं जो युगों से मानव जाति का कल्याण करते आये हैं। दशाश्वमेध घाट पर कपड़ों और कैनवास की बनी छतरियों के नीचे बैठे पंडे मेरी पहचान हैं। सुबह के सूर्य की तेजस्वी किरणों के आगमने से पहले ही मेरे ये घाट जाग जाते हैं। ब्रम्ह मूहूर्त मे डूबकी लगाते लोंगे के मुख से निकले हर हर गंगे औऱ बंम बंम भोले की गूंज रात की निद्रा तोडती है।शंख की नाद औऱ मंदिर के घंटो की मधुर ध्वनि से प्रभात का स्वागत होता है, यहां की सुबह मनभावनी है।तभी तो कहा जाता है सुबहे बनारस ।
मैं मंदिरों का शहर हूं। काशी विश्वनाथ, संकट मोचन, मानस मंदिर जैसे अनेको मंदिर है मेरी धरती पर जहां श्रद्धा का अर्ध हर समय चढता नजर आयेगा आपको। देश विदेश से प्रतिसाल 2 लाख से अधिक श्रद्धालु व पर्यटक ज्ञान व मोक्ष की प्राप्ति की चाह लिये मेरे दर पर आते हैं। वेदव्यास जी ने मेरी महिमा का वर्णन करते हुये लिखा है..
गंगा तरंगा रमणीय जटाकलापम
गौरी निरंतर विभूषिता वामाभागम
नारायाणाप्रिया अनंगा मदापहारम,
वाराणसी पूर पतिम भज विश्वनाथं                                            
मेरा इतिहास इतना वृहद औऱ विशाल है कि अगर लिखना प्रारंभ किया जाए तो एक युग कम पड जाएगा। गंगा तट पर बसा मैं एक प्राचीन क्षेत्र हूं। प्राचीन काल मे मुझे अविमुक्ता,आनन्दकानन,महासमासना,सुरधना,रम्या औऱ काशी के नाम से जाना जाता था लेकिन कालांतर मे वरुणा औऱ असि नदियों के उद्गम स्थल पर बसे होने के कारण मैं वाराणसी हो गया। युग युगांतर से मेरे अनेकों नाम रहे है। किवदंतियों के अनुसार हजारों वर्ष पूर्व कुछ नाटे कद के सांवले लोगों ने मेरी नींव डाली थी। तभी यहां कपडे औऱ चांदी का व्यापार शुरु हुआ। कुछ समय उपरांत पश्चिम से आये ऊंचे कद के गोरे लोगों ने मुझे अपनाया जिनको पुराणों मे आर्य यानि श्रेष्ठ व महान कहा गया।बाद मे आर्यों का मै पनाहगाह बन गया, अयोध्या में भी तभी उनका राजकुल बसा जिसे इक्ष्वाकु का कुल कहा गया। काशी मे चन्द्र वंश की स्थापना हुयी। सैकडों वर्ष मेरे इस क्षेत्र पर भरत राजकुल के चन्द्रवंशी राजा राज करते रहे।
मै आदिकाल से धर्म औऱ शिक्षा की औलौकिक ज्योति जलाता रहा हूं। सदियों पहले मेरी गोद मे बैठ कर सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने दुनिया को सत्य का पाठ पढाया। युगों युगों से गंगा के तटों पर बैठ कर न जाने कितने महात्मा सनातन धर्म के रक्षार्थ तप औऱ यज्ञ करते आये हैं।पुराणों के अनुसार मै भगवान भोले नाथ के त्रिशूल पर बसा हूं। ऐसा माना जाता है कि पूरे विश्व का विनाश हो सकता है पर मेरा नहीं क्योंकि मै पृथ्वी से अलग हूं।
धर्म से लेकर संस्कार तक औऱ शिक्षा से लेकर सियासत तक मै प्रारम्भ से ही हर जगह प्रासंगिक रहा हूं। दुनिया का सबसे पुराना शिक्षा केन्द्र आज भी मेरे वक्ष स्थल पर उसी शान से जिंदा है जिस शान से सदियों पहले इसकी स्थापना हुई थी। मैं उत्तर प्रदेश का एक मात्र ऐसा नगर हूं जहां पांच विश्वविद्यालय पूरे देश मे शिक्षा की अलख  जगा रहे हैं।आज भी दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता के निशान खुद मे सजोये हुये मेरे शहर की खूबसूरती,इसकी सादगी कण कण में विद्यमान है।
देश की कई महान विभूतियों ने मेरी शोभा बढाई है। महर्षि अगस्तय की तपोस्थली हूं मै तो उस्ताद विस्मिल्ला खान की शहनाई मे मेरी धरती ने ही मिश्री घोली। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत घराने का सूत्राधार मैं ही हूं। मैं कवि,पंडित,दार्शनिक,संगीतकार औऱ लेखकों की कर्म भूमि रहा हूं। जयशंकर प्रसाद,तैलंग,बाबा किनाराम,मुंशी प्रेमचंद्र,गोस्वामी तुलसीदास,हरि प्रसाद चौरसिया,उस्ताद विस्मिल्लाह खान औऱ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जैसे ना जाने कितने नाम है जिनकी लेखनी को धार दी है मैंने। मेरी गोद मे बैठ कर ही बंगाली साहित्यकार विभूती भूषण बन्धोपाध्याय ने बांग्ला उपन्यास अपराजिता की रचना की थी। मेरी धरती पर रचा गया यह वही उपन्यास है जिस को आधार बनाकर सत्यजीत राय ने कालजयी कृति अप्पू ट्रीलॉजी का निर्माण किया औऱ तो औऱ इस फिल्म की शूटिंग भी मेरी वादियों मे ही की गयी। कर्टवेलीस नें ओपेर राइस एंड फाल आफ दी सिटी आफ महागॉनी मे बनारस गीत की रचना की। मैं साहित्य जगत को तुलसी दास जी के समय से ही आकर्षित करता रहा हूं..जापानी लेखक सुशाकु एन्डू ने डीप रिवर,ज्योफ डेयर ने 2009 में उपन्यास जेफ इन वेनिस डेथ इन वाराणसी तथा चेतन भगत नें अपने उपन्यास रेवुल्युशन 2020 में मेरा उल्लेख किया है।
मायानगरी के लिये मेरी भूमि जहां फिल्मों का आधार स्तम्भ रही है वही हालीवुड की नामचीन हस्तियों के लिये भी मैं आकर्षण का केन्द्र रहा हूं। मैडोना तो मेरी वादियां में ऐसी खोई की तीन महीने का समय कब गुजर गया उन्हे पता ही नहीं चला। गोल्डी हान ,जुलिया राबर्टस,ब्रेड पिट,केट विन्सलेट,एंजलीना जोली,पेरिस हिल्टन,टांम क्रूज जैसे विदेशी कलाकर मेरे अंचल की कला,संस्कृति औऱ सभ्यता के आगे नत मस्तक हो चुके हैं।
मेरी साडियों का ऐसा आकर्षण है कि हर नारी इनमे लिपटकर आइना देखना चाहती है।मेरे पान की लाली की लालिमा का गान सिनेमा जगत भी करता है। शिव की नगरी मे बनी ठंढई की मादकता औऱ शीतलता की दुनिया दीवानी है।यहां का लंगडे आम की मिठास के आगे मिश्री का स्वाद भी फीका लगता है। गले मे लाल गमछा डालकर गलियों मे फिरते लोग मेरी पहचान है। मुह में पान औऱ गले मे लाला गमछा डाल कर गलियों मे फिरते लोगों को रौब को ही देख कर किसी ने इन्हे बनारसी बाबू कहा था। मेरे लोग विश्व के कोने कोने मे निवास करते है भले ही मेरे लोगो के घर बदलते रहे हो लेकिन बनारसी बाबुओं की ठसन आज तक नहीं बदली है।
हस्तशिल्प का एक नायाब उदाहरण हूं मैं। प्रदेश का इकलौता रेल इंजन कारखाना डीरेका मेरे ह्रदय स्थल पर स्थित है। एक तरफ मैंने महामना मदन मोहन मालवीय के सपनों को मूर्त रुप लेते हुये देखा है। तो दूसरी तरफ एक झोपडी से निकलकर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले लालबहादुर शास्त्री के संघर्षों का गवाह भी हूं मैं। न जाने कितने उपनिषद,पुराण,ग्रंथ औऱ साहित्य मेरे अंतस से निकल कर पूरे विश्व को प्रकाशवान कर रहे हैं।
मैंने भारतीय राजनीति को कमला पति त्रिपाठी,लाल बहादुर शास्त्री औऱ राजा विभूतिनरायण सिंह जैसे शिखर पुरुष दिये हैं। इतनी बडी उपल्ब्धि होने औऱ धर्म की नगरी होने के बाद भी मै विगत कुछ सालों से अपराधियों का पसंदीदा स्थल बन गया हूं। अपहरण औऱ डकैती जैसे अपराध यहां उद्योग का रुप ले रहे हैं। शिव की नगरी मे कानून की धज्जियां उड रही हैं।
मै उत्तर प्रदेश का सबसे सघन आबादी वाला शहर हूं। मेरी गलियां तो इतनी प्रसिद्ध है कि इनका जिक्र फिल्म से लेकर इल्म तक मे होता है। बेतरतीब बसे होने के कारण उचित विकास का आभाव यहां हर तरफ व्याप्त है। घाटों का उचित व्यवस्थापन,शहर मे फैली गंदगी औऱ निकासी व्यवस्था का नितांत आभाव है। विकास औऱ कानून व्यवस्था का हाल बेहाल है।आलम ये है कि आज मैं विकास को खोजते खोजते अपनी ही गलियों मे खोता जा रहा हूं। लोगों को आज मेरी फिक्र नहीं फिक्र इस बात की है कि कौन मेरी धरती पर चुनाव कौन लड़ रहा है..चुनाव कोई भी लडे लेकिन जीते वही जो मुझे औऱ मेरी जनता को एक नई पहचान दे सके क्योंकि मेरी पहचान मेरा अस्तित्व प्राचीन काल से वही है जो आज है लेकिन विकास की एक नई पहचान की मुझे बरसों से दरकार है..
केदारनाथ सिंह की पंक्तियों में कहूं तो,

किसी अलक्षित सूर्य को देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टांग से बिल्कुल बेखबर।


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