Saturday, February 15, 2014

इस बार किचड होली

भई किसी जमाने में जमाना इत्ता खराब रहिस की पंकज उधास रेडियो पर बेनकाब नहीं निकलन की नसीहत देत रहे औऱ अब जमाना इत्ता खराब से कि नकाब उतारे के भी कालिख पोती जा रही है भई सबका रुआब खतरे में सै..टीवी पर कीचड ही फीचर है..अरे आम आदमी ने पार्टी बना ली तो सारे खास आदमी की सूरत औऱ सीरत खतरे में पडरइस है...सुना है आम आदमी अपनी झाडू में कीचड लपेटे घूम रहे हैं..जब से कुछ खास आदमी के मुंह पर कीचड भरी झाडू पडी है..तब से सारे खास आदमी सतर्क है औऱ आम आदमी से खुन्नस निकालने की ताड में हैं..सब ने अपनी अपनी जेब तक में कीचड भर रखा है..जब जरुरत पड रही है निकाल कर दूसरे के मुंह पे पोत दे रहे है.. अन्ना जान गये थे कि कीचड होली खेली जानी है सो अबकी वो अनशन करने दिल्ली नहीं आये बल्कि रालेगान सिद्धी में ही बिस्तर लगा लिया..पोलिंग का पोल अब खुल चुका है..कहते हैं कि कीचड में कमल खिलेगा....सब कुछ टम्प्रैरी लग रहा है बस परमानेंट है तो बस कीचड.. हर कोने में पीक है, बाकी सब ठीक है. जहां भी सफाई है, अस्थाई है.कीचड परमानेंट है स्थाई है..कई तो पहले से ही कीचड में सने घूम रहे थे उन्हे थोडी कम दिक्कत है लेकिन वो लोग खासे परेशान है जो कीचड देख कर रास्ता बदल देते थे..लेकिन इस बार तो जिस रास्ते जा रहे हैं वही पर कोई न कोई मिल जा रहा है नहलाने के लिए..बाल्टी भर कीचड लिए...सो इस बार कीचड से अपने दामन को बचाना मुस्किल लग रहा है..

Thursday, February 13, 2014

दलितों पर दंगल


तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार,   जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी..  'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है... ये महज चुनावी नारे नहीं बल्कि सियासत का वो अध्याय है जिसके हर एक पन्ने पर दलित राजनीति की इबारत लिखी है...औऱ इसी के सहारे पहले काशी राम ने औऱ फिर मायावती ने दलितों को उनकी सियासी ताकत का अहसास कराया।उत्तर प्रदेष से उठी अहसास कराया...उत्तर प्रदेश से उठी दलित राजनीति की यह लहर हांथी पर सवार होकर दिल्ली कूच करने की तैयारी में हैं.. हांथी की मदमस्त चाल को रोकने के लिए हर राजनीतिक पार्टी दलितों को अपने पाले में करने की तैयारी में है....

 देश के 12 राज्यों में दलितों का दबदबा है......उत्तर  प्रदे में सबसे ज्यादा 351.5 लाख दलित वोटर्स हैं...वेस्ट बंगाल में 184.5 लाख,महाराष्ट्र में 98.8 लाख,राजस्थान में 96.9 लाख,मध्य प्रदेश में 91.6 लाख,कर्नाटक में 85.6 लाख, पंजाब में 70.3 लाख, ओडिसा में 60.8 लाख औऱ हरियाणा में 40.9 लाख दलित वोटर हैं...   देश की कुल आबादी का 17 फीसदी हिस्सा दलितों का  है....लोकसभा की 543 सीटों में से 84 सीट अनुसूचित औऱ 47 सीट अनुसूचित जन जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है.. आंकडो के मुताबिक दलितों का 50 फीसदी वोट पर क्षेत्रीय पार्टियों का कब्जा है... वही दलितों का 30 फीसदी वोट कांग्रेस को  ,12 फीसदी भाजपा को औऱ 8 फीसदी वोट अन्य पार्टियों को मिलता है.... दलितों की आधी आबादी यूपी,बिहार,बंगाल, पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु में है.... उत्तर प्रदेश में 21.1 फीसदी , पश्चिम बंगाल में 23.0 फीसदी, बिहार में 8.2 प्रतिशत, तमिलनाडू में 19.0 प्रतिशत.इन राज्यों में लोकसभा की 201 सीटें हैं..... दलित वोट बैंक पर पकड रखने वाली पार्टियों का दबदबा  इन राज्यों में शुरु से रहा है....
 हिन्दी पट्टी के राज्यों में दलित वोट बैंक पर सबसे मजबूत पकड बीएसपी की रही है....लेकिन हाल में हुये पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के नतीजे बीएसपी के लिए बेहतर नहीं रहे.....आंकडों से साफ है कि राजस्थान में 17.09 फीसदी,मध्यप्रदेश में 15.7,छत्तीसगढ में 11.61 औऱ दिल्ली में 16.92 फीसदी दलित वोटर्स का विभाजन हुआ.. यानि यह तो साफ है कि कहीं न कहीं दलित वोटर्स भी इस बार के चुनाव में उन सीमाओं को तोडने वाला है..जिनमें उन्हे आज तक बंधा हुआ माना जाता रहा है......
 विकल्प औऱ सुशासन के संकलप के साथ चुनावी मैदान में उतरी भाजपा भी इस बार सवर्णों औऱ बनियों की पार्टी का चोला उतारने के लिए बेचैन है..बीजेपी इस बात को बखूबी जानती है कि दिल्ली पर कब्जा करने के लिए उसे 2009 के मुकाबले 2014 में करीब 10 फीसदी अधिक वोट हासिल करने होंगे... इस लिए पार्टी की नजर दलित वोटर्स पर है....गुजरात में 50 फीसदी दलित वोट मिलने से उत्साहित बीजेपी ने पूरे देश के दलित वोट बैंक में बडी सेंध लगाने के लिए रणनीति बनानी शुरु कर दी है....पार्टी  दलित एकादशी सीरीज नाम से 11 दिनों तक चलने वाले कार्यक्रम का आयोजन करने वाली है.......इसके तहत बाबू जगजीवन राम के जन्मदिन 5 अप्रैल से लेकर बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल तक पार्टी देश भर में दलितों की दशा औऱ दिशा पर चिंतन करेगी..बीजेपी को पुरानी पीढी के दलितों से ज्यादा युवा पीढी पर भरोसा है.... इस लिए उसके निशाने पर  इस समाज के पढे-लिखे मिडिल क्लास नौजवान हैं....
 दलित वोटो पर कब्जा करने का दंगल शुरु होने वाला है लेकिन..सबसे अहम सवाल ये है कि जिन  मुद्दों पर कांग्रेस, बीजेपी,लेफ्ट,सपा जैसी पार्टियां 2014 का मैदान मारना चाहती है क उनमें से कितने मुद्दे दलित हितों से जुडे हैं...सवाल ये भी है कि क्या दलित अपने हितों को भुलाकर उन मुद्दों पर मतदान करेंगे जो तमाम सियासी पार्टियां उछाल रही हैं....  
 भले ही देश की राजनीतिक पार्टियों की नजर दलित वोट बैंक में टिकी हो लेकिन इन पार्टियों के लिए दलित वोट बैंक में सेंध लगापाना आसान नहीं हैं.. खासतौर से यूपी में जहां 2009 में बीएसपी ने भले ही 20 सीटें जीती लेकिन वह 47 सीटों पर दूसरे नम्बर थी...इसी आंकडे के सहारे हांथी पर सवार मायावती सभी राजनैतिक दलों को कुचलते हुए दिल्ली कूच करने की तैयारी में हैं....ऐसे में मायावती की मुट्ठी से दलित मतदाताओं को निकाल पाना आसान नहीं है.. वहीं बिहार की दलित राजनीति एक दिलचस्प मोड पर है जहां दलित वोट बैंक के एक नहीं कई दावेदार मैदान में हैं...रामविलास पासवान का अपना वोट बैंक है तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद का अपना आधार....महा दलित का नारा लगाकर दलित वोट बैंक को दो फार करने की नितीश की कोशिश अपने चरम पर है.....तो बीजेपी के पास दलित नेताओं की एक लम्बी चौडी फौज है जो दलितों को केसरिया रंग में रंगने को बेकरार है...तमिलनाडु की दलित राजनीति पर पारंपरिक रुप से डीएमके औऱ अन्नाद्रमुक का कब्जा रहा है...लेकिन बंगाल में लेफ्ट सरकार के पतन के बाद देखना दिलचस्प होगा की वहां के दलित वोटर एक बार फिर दीदी के साथ जाते हैं या फिर वो वामदलों का रुख करने के मूड में है.... 
 माना जाता है.कि 2014 का फैसला 14 करोड से ज्यादा वो युवा वोटर्स करेंगे जो पहली बार मतदान केन्द्रों पर पहुंचेंगे....लेकिन राजनीतिक पार्टियां जिस तरह से दलितों पर दंगल करने की तैयारी में हैं उसकी पूरी तस्वीर चुनाव के नतीजों से उभरेगी




Sunday, February 2, 2014

रो रहा हूं मैं( अमेठी)

मैं अमेठी हूं,पहले मैं सुल्तानपुर जिले की एक तहसील था पर कालांतर में मेरा इतिहास औऱ भूगोल बदल दिया गया। मेरा नाम दो बार बदला गया औऱ आज मैं अमेठी नहीं छत्रपति शाहू जी महराज के नाम से एक जिले के रुप में जाना जाता हूं। पर ना जाने क्यों मेरा मन अमेठी मे ही बसता है। मैं संसदीय क्षेत्र के रुप मे अमेठी ही हूं। आजादी के बाद से ही मैं नेहरु-गॉधी परिवार का चहेता रहा हूं। 1980 से मेरा प्रतिनिधित्व इसी परिवार के हाथों में है। मैंने आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले औऱ सूचना क्रांति के जनक राजीव गांधी के रुप में देश को एक दूरदर्शी प्रधानमंत्री दिया। मैं उस वक्त चर्चा मे आया जब कांग्रेस के छोटे सरकार कहे जाने वाले संजय गांधी ने लोकसभा में जाने के लिए मुझे चुना। तभी से मेरा नाम गांधी नेहरु परिवार के नाम से जुड गया। आज भी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी लोक सभा में मेरा ही प्रतिनिधित्व करते हैं।
गांधी परिवार के चार सदस्य मेरे क्षेत्र से चुनाव लड चुके हैं औऱ मेरी जनता ने उन्हें लोकसभा तक पहुचाया है। जवाहर लाल नेहरु के पिता औऱ इंदिरा गांधी के दादा मोती लाला नेहरु ने अपनी वकालत की शुरुआत यहीं से की थी। आज मैं भले ही गांधी परिवार का चहेता हूं , लेकिन उस हिसाब से मेरा विकास नहीं हो पाया है। इस बार विकास औऱ प्रगति की बहुत सी उम्मीदे मैने सजा रखी हैं ।
उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों की भांति मेरी आर्थिक प्रगति कृषि पर आधारित है। परंतु दुख इस बात का है कि देश के सबसे बडे घराने के इतना करीब होने के बावजूद मेरे किसान भाइयों की हालत में कोई सुधार नहीं आया है। किसानो को समय पर खाद औऱ बीज नहीं मिल पाता तो सिंचाई सुविधा के अभाव में उन्हें मजबूरन खेती से मुंह मोडना पड रहा है।
यूं तो मेरे यहां कल कारखाने खोलने के कई वायदे कई सालों से हो रहे हैं। लेकिन आज भी रोजगार के मामले में भी मैं फिसड्डी साबित हो रहा हूं। रोजगार के लिये यहॉ के युवाओं अन्यत्र पलायन करना पड रहा है।

शिक्षा को बढावा देने के लिये कई घोषणायें भी हुयी हैं। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने यहां पर आईआईटी समेत कई उच्च शिक्षण संस्थान स्थापित करने के वायदे किये हैं, पर अब तलक उन्हें अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। देश के मानचित्र पर गर्व से अपना सिर उठाये मैं अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा हूं सिर्फ इस वजह से कि राहुल गॉधी को रुप में मैंने वह जन प्रतिनिधि पाया है जो संसद में मेरा प्रतिनिधित्व करता है,पर कभी-कभी मुझे लगता है कि बस दिल को बहलाने का यह ख्याल अच्छा है। इस बार उम्मीद के दिये फिर जले हैं..कुछ लोग मेरी धरती पर आये हैं..जिन्होंने मेरी तस्वीर बदलने का वादा किया है..देखता हूं क्या होगा मेरा।