Friday, January 31, 2014

आम चुनाव : छोटे दलों के बडे मंसूबे..

छोटे दल बडा मंसूबा

 पन्द्रहवीं लोकसभा के गठन के लिए होने वाले आम चुनाव में अहम मुद्दो के गायब होने औऱ किसी लहर के आभाव में चुनाव के बाद त्रिशंकु स्थिति के आसार अगर नजर आते हैं तो ऐसे में क्षेत्रीय औऱ छोटे दले की भूमिका बढ जाएगी।लोकसभा चुनाव में बाजी मारने वाली दो ही पार्टियों का नाम आता था..बीजेपी या फिर कांग्रेस..नाम भले ही दो पार्टियों का लिया जाता रहा हो लेकिन आशय दो गठबंधन से ही होता था..यूपीए औऱ एनडीए.. एक वक्त था जब देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी फिर भाजपा ने अपने नाम का डंका बजाया..लेकिन इसके बाद मिली जुली सरकार की ऐसी बानगी बनी की पूरा देश गठबंधन की राजनीति के बीच चक्कर काटने लगा..केन्द्र में पहले 22 दलो के गठबंधन वाली एनडीए सरकार बनी औऱ फिर दो बार कांग्रेस की यूपीए गठबंधन की..इस बार भी ऐसा लग रहा है कि किसी को पूर्ण बहुमत न मिले... इसी संभावना के मद्देनजर क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं भी जोर मारने लगी हैं।  पहले आम चुनाव में देश में 14 राष्ट्रीय दल थे औऱ क्षेत्रीय दलों की संख्या केवल 39 थी वहीं 2009 के लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय दलों की संख्या 7 रह गयी औऱ क्षेत्रीय दल कुल मिलाकर 360 हो गए थे... पहली लोकसभा चुनावों में भाग लेने वाले क्षेत्रीय दलों को सिर्फ 34 सीटों पर संतोष करना पडा था वहीं आंकडे बताते हैं कि 2009 के चुनावों में देश से क्षेत्रीय दलों के 146 सांसद जीतने कर आये..आंकडे यह भी बताते हैं कि इन दलों को कुल मतदाताओं के आधे से अधिक का समर्थन मिला था।
                                               कांग्रेस भले ये दावा ठोके कि उसके पास मजबूत संगठन औऱ चाक-चौबंद रणनीति है लेकिन इस बार उसे अपने सहयोगी दलों से जूझना पड सकता है...इन सहयोगी दलों में शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा,मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सपा,लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल औऱ राम विलास पासवान के नेतृत्व वाली लोकजन शक्ति पार्टी शामिल है।ऐसे हालात में कांग्रेस के पक्ष में हवा है ये कहना गलत होगा। सत्ता रुढ गठबंधन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथ साथ मुख्य विपक्षी गठबंघन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी इस चुनाव में बहुत अच्छी स्थिति में नहीं लगता। पिछले 12 साल से राजग का हिस्सा रहे बीजू जनता दल ने भाजपा औऱ राजग से किनारा कर लिया है..उधर वाम मोर्चा तीसरा मोर्चा खडा करने की जुगत में है..अनुमान है कि नतीजे आने के बाद कई दल उनके पाले में जा सकते हैं...
 पिछली सरकार की बात करें तो कांग्रेस के 151 में से 30 सांसद 42 सीट वाले आंध्र प्रदेश से चुने गए थे...द्रमुक की अगुवाई वाल डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्तारुढ यूपीए का सबसे बडा भागीदार है। तमिलनाडु में लोकसभा की 39 सीटें हैं औऱ इस फ्रंट ने 39 में 39 सीटे जीती थी..यूपीए के दूसरा सबसे बडा घटक लालू प्रसाद की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनता दल है जिसने कुल 40 लोकसभा सीटों में से 23 पर फतह हासिल की थी..इस तरह से आंध्र प्रदेश,बिहार,औऱ तमिलनाडु से 100 से ज्यादा सांसद संप्रग की झोली में आए थे औऱ इन्हीं राज्यों में अगले चुनाव की किस्मत की चाबी है।
भाजपा भले ही इस चुनाव में सबसे बडी ताकत बन कर उभरे लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि भाजपा या कांग्रेस को 160-170 से अधिक सीटे नहीं मिल सकती है,ऐसी स्थिति में तीसरा मोर्चा उनका होगा जिन्हें हम क्षेत्रीय दल कहते है....वामपंथी दलों को इसी में शामिल किया जा सकता है लेकिन इस मोर्चे की ताकत भी भाजपा-कांग्रेस के आस-पास जितनी ही होगी..इस बार जो नयी आकृति उभरी है वह है आम आदमी पार्टी..भले ही आप ने पहली बार में दिल्ली की गद्दी जीत ली हो लेकिन देश की राजधानी दिल्ली की गद्दी को वो दूर से ही देख सकती है...अनुमान लागाए जा रहे हैं कि इस बार के चुनाव  आप जो सेंध लगाएगी उसमें से 15-20 से लेकर 30-40 सीटे मिल सकती है..अगर आप 30 से 40 सीटों का आंकडा छू पाती है तो संभव है कि तीसरी पार्टी बडी पार्टी आप ही बने औऱ अगर ऐसा नहीं होता है तो भी देश के अन्य प्रमुख क्षेत्रीय दल जैसे सपा,बसपा,जेडीयू,द्रमुक,अन्ना द्रमुक जितनी ताकतवर तो आप भी बनेगी..यानी तब संसद में एक औऱ क्षेत्रीय दल होगा..
यह अवश्य देखने की बात होगी कि न किसी को समर्थन देंगे, न किसी से समर्थन लेंगे का नारा लगाने वाली आप अगली संसद में कैसी भूमिका निभाती है? मगर, इतना तो अभी से दिख रहा है कि देश के छोटे दल अगली लोकसभा में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी में हैं। यह एक हकीकत है कि पिछले लगभग 25 साल में केंद्र की सरकारें क्षेत्रीय ताकतों के सहारे से ही चली हैं और आगे भी आसार ऐसे ही दिख रहे हैं।
 सवाल यह है कि क्षेत्रीय दलो का सहारा भाजपा या कांग्रेस के लेए गले की फांस तो नहीं बन जाएगा..औऱ अगर ऐसी स्थिति आती है कि गैरे कांग्रेसी औऱगैर भाजपाई दलों को सरकार बनाने का मौका मिला तो अपने हिस्से के नाम पर सत्ता में बंदरबांट तो नहीं होगी...आदर्श स्थित तो यह है कि आगामी चुनाव  में किसी एक दल अथवा गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिले लेकिन अगर गठबंधन को मौका मिलता है तो स्थिति समझौतों वाली बनती है। सियासत में समझौता बुरा नहीं है लेकिन समझौता सत्ता के लिए नहीं सुशासन के लिए होना चाहिए...